Sunday, June 1, 2008

खरी-खोटी दोहों की जुबानी-4

कैसे कितना कब कहां कोई भी महफूज़।
मन के आंगन में जहां आतंकों की गूंज।।

चक्की में पिसते रहे बस मज़दूर-किसान।
कुर्की घर की बोलती-बाक़ी क़र्ज-लगान।।

मसिजीवी के हाथ में-जबसे है बंदूक।
टुक़डे-टुकड़े ज़िंदगी-क्या कहती दो-टूक।।

सुर्ख़ रंग की भारती-चीख रही तस्वीर।
तोते मंडन मिश्र के, बांच रहे तकदीर।।

अनगिन हैं बैसाखियां-केवल एक सवार।
सुरसा के मुंह बैठता-जनता के दरबार।।

रोज कमीशन बैठते-करते लंबी जांच।
सच ने अंतिम सांस ली-कहां झूठ को आंच।।

घर में ही घर कर चुके-अपराधों के प्रेत।
क्रूर काल के हाथ से-सरके जैसे रेत।।

कौन किसी से कम यहां, सब हैं अफलातून।
लाठी जिसकी भैंस है, बेचारा कानून।।

फुनगी-फुनगी चढ़ गए, भक्षक तक्षक नाग।
जनमेजय का हो रहा पानी-पानी आग।।

हवा चली फैली यहां आरक्षण की आग।
धुंआ-धुंआ सपने हुए, उजड़े कई सुहाग।।

जो भी अच्छी बात को करते नहीं क़बूल।
जाहिर उनकी ज़िंदगी चलती बिना उसूल।।

चीख रहीं पगडंडियां-गली-गली में शोर।
संसद-सड़कें-कुर्सियां, सच्ची आदमखोर।।

शीशमहल के शीर्ष भी, चूमे जब दहलीज।
लोकतंत्र की रीति की बेशक भली तमीज।।

झूठ कभी पचता नहीं, सच से नहीं निबाह।
ऐसी लंगड़ी सोच का, क्या होगा अल्लाह।।

2 comments:

sushant jha said...

अद््भुत है...

राजीव रंजन प्रसाद said...

हर दोहा बेहतरीन है, बधाई स्वीकारें।

***राजीव रंजन प्रसाद्