Sunday, June 1, 2008

बेरहम है वक़्त

हो रही है चित्रपट-सी
भंगिमाएं प्यारकी,
आंख में अभिव्यक्ति लहरे
दर्द के संसार की।

लाजवन्ती मानकर
जो तर्जनी पीछे मुड़ी,
वह स्वयं आवृत्तियों से
भंवर-सी औचक जुड़ी,

प्रश्न चर्चामुक्त अब तो
अतिक्रमण-विस्तार की।

शीश पर बांधे कफन
इतिहास की परछाईयां,
खोजती हैं बुलबुलों के
गांव की अमराइयां,

बेरहम है वक़्त जैसे
धार हो तलवार की।

हम टंगे हैं खूंटियों पर
रेशणी बनकर कमीज,
तोड़ जाती बाजुओं तक
सीयने जिनकी तमीज,

यह ग्रहण है ज़िंदगी पर
राहु के परिवार की।

2 comments:

बाल किशन said...

"बेरहम है वक्त जैसे
धार हो तलवार की"
" यह ग्रहण है ज़िंदगी पर
राहु के परिवार की"
" हो रही है चित्रपट-सी
भंगिमाएं प्यारकी,
आंख में अभिव्यक्ति लहरे
दर्द के संसार की"

अद्भुत रचना है.
आभार.

अजित वडनेरकर said...

बेरहम है वक्त जैसे
धार हो तलवार की।
बहुत सुंदर कविता है। लगता है आपके ब्लाग पर
अब अक्सर आना होगा।
ब्लागजगत में आपका स्वागत है.