Monday, January 5, 2009

मजाक नहीं है, आतंकवाद का खात्मा !

“आइने से मुकर गए साहब,
बात क्या थी कि डर गए साहब।
आप अब भी हमारे सर पर हैं,
सिर्फ नजरों से उतर गए साहब।। ”

स्व. जय प्रकाश बागी (वाराणसी) की उपरोक्त पंक्तियों को व्यक्ति, समूह, समुदाय, समाज, देश एवं राष्ट्र अथवा किन्ही अन्य संदर्भों के परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा सकता है। प्रासंगिक है कि नववर्ष 2009 के पहले दिन से ही जम्मू कश्मीर के मेंढर में आतंकवादियों द्वारा बंकरों से आतंक का आग उगलना। कारगिल-2 की पुनरावृत्ति का एक कुत्सित प्रयास जारी है। 26/11 की आतंकवादी घटना ने संपूर्ण देश को हिलाकर रख दिया है। इसमें पाकिस्तान की घिनौनी भूमिका सिद्ध होने के बावजूद उसकी बेशर्मी और बेहयाई से सारी दुनिया हतप्रभ है। अंतरराष्ट्रीय दबावों को ताक पर रखते हुए पाकिस्तान अपनी फौज को भारतीय सीमाओं पर तैनात कर उल्टा चोर कोतवाल को डांटे कहावत को चरितार्थ करने पर तुला है। वर्तमान भारतीय सरकार अपनी एड़ी चोटी एक करके भारतीय जनता के समक्ष अपनी विश्वसनीयता का परचम लहराने पर आमादा अवश्य दीखती है किन्तु उसके द्वारा पाकिस्तान को मजबूर कर अपना दोष कबूल कर गुनहगारों को दंडित करा पाना संदेहास्पद ही दीखता है। चुनावी वर्ष में कांग्रेस की गिरती हुई साख को रोकने का चमत्कारिक प्रयास संभव नहीं दीखता।

मेरी समझ में इतने विशाल लोकतांत्रिक देश को प्रगति और विकास के मार्ग पर ले जाने अथवा किसी भी संगीन समस्या से निजात दिलाने से पूर्व देश के प्रत्येक नागरिक और नागरिकों की सुरक्षा की गारंटी लेने वाली सरकार का नैतिक दायित्व बनता है कि वो आत्मनिरीक्षण करे और अपने दोष को देखे कि क्या वो भ्रष्टाचार के विनाश के अभाव में देश के समुचित विकास हेतु आतंकवाद समाप्त करवा पाने में सक्षम है ?

जी कत्तई नहीं! हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार का जिस कदर प्रवेश हो चुका है, उससे समस्याओं से निजात पाना बड़ा मुश्किल है। भ्रष्टाचार देश की सभी समस्याओं की जड़ में है। आतंकवाद का भयानक स्वरुप भी उसी भ्रष्टाचार के कारण है क्योंकि हमारी सरकारें भ्रष्टाचार की पूरी गिरफ्त में हैं। वर्तमान सरकार भी उसका अपवाद नहीं है। आतंकवाद का घिनौना खेल तब तक चलता रहेगा, जब तक राजनेताओं द्वारा देश में कुर्सी पाने और देश पर राज करने में भ्रष्टाचार का खेल खेला जाता रहेगा। यकीन मानिए, बगैर भ्रष्टाचार मिटाए आतंकवाद नहीं मिटाया जा सकता और न तो गरीबी ही मिटाई जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट की मानें तो सच है कि देश भगवान भरोसे चल रहा है। पिस तो रही है आम जनता, भ्रष्टाचारी फूल-फल रहा है। सरकार जनता के सिर पर उठी हुई दिखाई देती अवश्य है, लेकिन जनता की नजरों से उतरी हुई दिखाई देती है, क्योंकि आतंकवाद के खिलाफ बस खीसें निपोरने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला..। ये समझना अब जरुरी है कि मजाक नहीं है आतंकवाद का खात्मा।

2 comments:

Udan Tashtari said...

सही कहा आपने-मजाक नहीं है, आतंकवाद का खात्मा.

Amit said...

ये पंक्तियाँ सही में लाजवाब हैं....
आपका लेख भी काफ़ी अच्छा है...