Friday, May 30, 2008

खरी-खोटी दोहों की जुबानी-3

उपलों की दीवाल पर, पुरखों की खपरैल।
ज़र्रा-ज़र्रा ज़िंदगी, होती रही रखैल।।

जनता चिड़िया-सी हुई, सत्ता अजब गुलेल।
अपराधों की छांव में, बढ़े सियासी बेल।।

आजादी के यज्ञ का, तप था पहरेदार।
भारत तो आजाद पर,राक्षस भ्रष्टाचार।।

चेहरे पे चेहरा चढ़ा, ओढ़ खोल पे खोल।
लल्लू पंजू ले छुरी, चले खोलने पोल।।

गांवों से लेकर लहू, दिल्ली करती ऐश।
घोटालों में तोड़ता, दम यह भारत देश।।

गोरखधंधे जो करे, वे ही बड़े हुजूर।
गांव-गरीबों के लिए, दिल्ली अब भी दूर।।

चमचे, बेलचे, खोमचे, चापलूस के भेद।
पीछे, आगे मार लो, वो पैरों की गेंद।।

नेता, अफसर,माफिया, डाकू, गुण्डे, चोर।
इनके पांव पसर गये, भारत अब कमजोर।।

उछल-कूद जितना करो, पकड़े रहो जमीन।
वरना थोथी ज़िंदगी, बस कौड़ी की तीन।।

सोनचिरैया गांव में, होती लहू-लुहान।
घाटी की बंदूक से, घायल हिंदुस्तान।।

2 comments:

राजीव रंजन प्रसाद said...

चेहरे पे चेहरा चढ़ा, ओढ़ खोल पे खोल।
लल्लू पंजू ले छुरी, चले खोलने पोल।।

गांवों से लेकर लहू, दिल्ली करती ऐश।
घोटालों में तोड़ता, दम यह भारत देश।।

बेहतरीन दोहे..

***राजीव रंजन प्रसाद
www.rajeevnhpc.blogspot.com

बाल किशन said...

सत्यम! शिवम्! सुन्दरम!