Tuesday, November 5, 2013

गंगा माई के किरिया

गंगा मइया के चुनरी पियरी चढ़वाइला
हम गंगा माई के किरिया रोजे खाइला
पुन्य भरल माटी के गगरी जब छलकाइला।

हिम के अंचरा दूध भरल, जलधार हऊ गंगा
धरती के माटी खातिर आधार हऊ गंगा,
अमिरित के सागर लहरेला तोहरा गोदी में-
तोहरे कूल कछारन में बिख बरसाइला ।

हरीद्वार में तोहके झंकली लगली भलमानुष,
जात-जात हुगली तक भइली निपटे बनमानुष,
कर्म कुकर्म के कूड़ा कचरा हिय में बा अपने
मन चंगा के खोल ओढ़ि जग के भरमाइला ।

जियले मुअले खइले-पियले बचपन बूढ़ जवानी,
सुरुज देव तुलसी माई के चाही तोहरे पानी
हर-हर गंगे, बम-बम भोले कासी में गूंजेला
बाकिर मनसा पाप न हम आपन धो पाइला ।

हम सभकर आखिन के पानी जरि के भसम भइल
चुल्लू भर पानी में डूबल अनगिन कसम कइल
माई के दुरदसा कपूतन के खेलवाड़ लगे
बेसरमी के खेल खेल सबके गरियाइला ।

पाप धोई तू आंख खोलि द हे गंगा मइया,
वरना अन्हरन के पाछे डूबी लंगड़न क नइया
जिनिगी के बेड़ा के सरगे धाम ले जाए के,
गंगा सुरसति माई दुनो के गोहराइला ।

सौंसे दूनिया में गंगा के नाम पवित्तर बाटे,
पुरखन के तारे खातिर सत्काम चरित्तर बाटे,
एक भगीरथ भाव समझिके तुहू टेघरलू माई,
कलजुग के एहि हाट बइठ, सनि के पटियाइला ।

-कुमार शैलेंद्र
05.11.2013

1 comment:

PoeticRebellion said...

शब्द कि इस मर्म को .... मैं यूँ समझ कर आ गया …
अल्फाज पढ़ के यूँ लगा .... खुद से ही मिल के आ गया ....

बहुत खूब ....

बहुत सालों से ऐसा नहीं पढ़ा। ।