Saturday, June 7, 2008

लोकतंत्र के पथ पर लेटी

- कुमार शैलेन्द्र

संसृति शक्ति स्रोत जननी
सोलह श्रृंगार करो।।

लाल हुई
सोने की चिड़िया,
संस्कृति की डाली,
तीली जली, धुंध उपवन में-
छद्नवेश माली,

तृण-तृण में पागल मन हर क्षण
सागर-सागर भरो।।

साजिश बर्फीली
घाटी में,
भीषण आगजनी,
लोकतंत्र के पथ पर लेटी-
सुरसा नागफनी,

फन विषधर के कुचलो, युग-
चेतन संचार करो।

पंजों में
फिर दु:शासन के
यह आंचल धानी,
छलके नयनों से करुणामय-
क्षार युक्त पानी,

गरजो पांचजन्य, प्रत्यंचा-
नव टंकार करो।

Thursday, June 5, 2008

महंगाई की आग में तेल


महंगाई ने खींच दी अबकी सबकी चूल।
मोहन-मुरली सोनिया बोने लगे बबूल।।

बोतल में जो बन्द था, राजनीति का जिन्न।
बैल मुझे आ मार ले जनता है अब खिन्न।।

दाम बढ़ाकर तेल का ले ली आफत मोल।
न्यौता पूर्ण विपक्ष को चल अब हल्ला बोल।।

डीजल औ' पेट्रोल से इतने गहरे घाव।
गली-गली ललकारती, जल्दी करो चुनाव।।

चौपटराजा राज में इतना बढ़ा अंधेर।
भेड़ बकरियां गुम हुईं कातिल हुआ गंड़ेर।।

खून, तेल से मांगती मनमोहन सरकार।
और अंतड़ियां भूख से रोतीं बुक्का फार।।

छुटभैयों जितना करो धरने औ' हड़ताल।
करवट बदले ऊँट क्या, इतना खस्ताहाल।।

देश बचाओ दोस्तों कांग्रेस कंगाल।
फिर अच्छे दिन आएंगे, होंगे मालामाल।।

दिल्ली की सरकार ने भेजा फौरन फैक्स।
मुख्यमंत्रियों तेल पर नहीं मांगना टैक्स।।


रोटी के लाले पड़े, खाली है अब ज़ेब।
गैस तेल के नाम पर होता रहा फ़रेब।।

खाद्य पदार्थों में लगी आग, आग बाज़ार।
बस्ती-बस्ती धधकती मचती हाहाकार।।

सभी चमेली चाचियां, दस जनपथ से दूर।
रोटी-सी जलने लगी, मस्त रहा तंदूर।।

तेल मूल्य की वृद्धि से इतना तो है साफ।
जनता भारत की उन्हें नहीं करेगी माफ।।

Tuesday, June 3, 2008

वर्षगांठ पर सोनचिरैया

ढीले हो जायेंगे बन्धन
गांठ मगर कस जायेगी,
वर्षगांठ पर सोनचिरैया
क्या-क्या बोल सुनाएगी।।

जलसे हमने जलकर देखे
जल काजल में बदल गया,
जाल संभाले मछुवारा मन
मत्स्यगंध पर फिसल गया,

आगामी सन्तति पुरखों की-
थाती ही खो जाएगी।।

पुष्पक में बैठे हैं हम सब
इन्द्रलोक में जाना है,
अग्निपरीक्षा का भय केवल
कंचन ही निखराना है,

ऊंची-ऊंची सभी उड़ानें-
नीचे ही रह जाएंगी।।

टूटी-बिखरी संज्ञाओं को
आओ क्रियापदों से जोड़ें,
संस्कार की सुप्तभूमि में
बीज विशेषण वाले छोड़ें,

वरना, व्यथा भारती मां की-
कोरी ही रह जाएगी।

काले हुए उजाले सपने



आंखों के अंत:पुर उर में-
इन्द्रधनुष-छवि वाले सपने,
पछुआई की झंझाओं ने-
प्रतिक्षण देश निकाले सपने।

लिखने को क्या नहीं लिखा है
स्वर-व्यंजन की भाषाओं में,
मन का किंतु व्याकरण उल्टा
उलझा सिर्फ तमाशाओं में,

अनुरंजन के विषदंतों से-
कुचले हैं रखवाले सपने।

विश्वामित्र हमारी संस्कृति
यज्ञ देवता के हम साधन,
बिसरे-भूले छंदों में फिर
कर जाएं विस्तृत आराघन,

केसर-कस्तूरी बरसा दे-
मेघ राशि जल वाले सपने।

चंद्रग्रहण-सी थमी झुर्रियां
मेधाओं के माथे फैलीं,
सदियों से होती आई यह
कंचन की थाती मटमैली,

सपनों में हम सपने बोते-
काले हुए उजाले सपने।

Monday, June 2, 2008

ढंको न सिन्दूरी मिट्टी से

नंगे पाँव भले चंगे हैं, नागफनी की पीर को ।
दिन के सपने तोड़ न पाते , सोने की जंजीर को।।

सूँघ गया है साँप
केवड़े की मदमाती गंध को,
नयी टहनियाँ भूल गयी है
माटी की सौगन्ध को,

हवा हादसों को गरियाती, पुरखों की जागीर को।।

द्वार, देहरी, आँगन , घर
नित नये-नये विस्फोट हैं,
मृत अतीत में झाँक रही अब
'अलगू ' की हर चोट है,

घुसा ताजगी में बासीपन, नीबू-रस ज्यों क्षीर को।।

शंकर का विषपान
राम के गौरवमय सोपान सा,
गौतम का हर बोध-स्थल ,
बस अपने हिन्दुस्तान सा ,

ढंको न सिन्दूरी मिट्टी से , तुलसी, नानक, मीर को।।

Sunday, June 1, 2008

खरी-खोटी दोहों की जुबानी-4

कैसे कितना कब कहां कोई भी महफूज़।
मन के आंगन में जहां आतंकों की गूंज।।

चक्की में पिसते रहे बस मज़दूर-किसान।
कुर्की घर की बोलती-बाक़ी क़र्ज-लगान।।

मसिजीवी के हाथ में-जबसे है बंदूक।
टुक़डे-टुकड़े ज़िंदगी-क्या कहती दो-टूक।।

सुर्ख़ रंग की भारती-चीख रही तस्वीर।
तोते मंडन मिश्र के, बांच रहे तकदीर।।

अनगिन हैं बैसाखियां-केवल एक सवार।
सुरसा के मुंह बैठता-जनता के दरबार।।

रोज कमीशन बैठते-करते लंबी जांच।
सच ने अंतिम सांस ली-कहां झूठ को आंच।।

घर में ही घर कर चुके-अपराधों के प्रेत।
क्रूर काल के हाथ से-सरके जैसे रेत।।

कौन किसी से कम यहां, सब हैं अफलातून।
लाठी जिसकी भैंस है, बेचारा कानून।।

फुनगी-फुनगी चढ़ गए, भक्षक तक्षक नाग।
जनमेजय का हो रहा पानी-पानी आग।।

हवा चली फैली यहां आरक्षण की आग।
धुंआ-धुंआ सपने हुए, उजड़े कई सुहाग।।

जो भी अच्छी बात को करते नहीं क़बूल।
जाहिर उनकी ज़िंदगी चलती बिना उसूल।।

चीख रहीं पगडंडियां-गली-गली में शोर।
संसद-सड़कें-कुर्सियां, सच्ची आदमखोर।।

शीशमहल के शीर्ष भी, चूमे जब दहलीज।
लोकतंत्र की रीति की बेशक भली तमीज।।

झूठ कभी पचता नहीं, सच से नहीं निबाह।
ऐसी लंगड़ी सोच का, क्या होगा अल्लाह।।

बेरहम है वक़्त

हो रही है चित्रपट-सी
भंगिमाएं प्यारकी,
आंख में अभिव्यक्ति लहरे
दर्द के संसार की।

लाजवन्ती मानकर
जो तर्जनी पीछे मुड़ी,
वह स्वयं आवृत्तियों से
भंवर-सी औचक जुड़ी,

प्रश्न चर्चामुक्त अब तो
अतिक्रमण-विस्तार की।

शीश पर बांधे कफन
इतिहास की परछाईयां,
खोजती हैं बुलबुलों के
गांव की अमराइयां,

बेरहम है वक़्त जैसे
धार हो तलवार की।

हम टंगे हैं खूंटियों पर
रेशणी बनकर कमीज,
तोड़ जाती बाजुओं तक
सीयने जिनकी तमीज,

यह ग्रहण है ज़िंदगी पर
राहु के परिवार की।